क्रोनिक किडनी डिजीज स्टेज 4 का आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट


किडनी की कार्य क्षमता कम होने में महीने से कई वर्षों तक का समय लगता है, तो उसे क्रोनिक किडनी डिजीज कहा जाता है। इस बीमारी की लास्ट स्टेज स्थायी रूप से किडनी फेल्योर होती है। क्रोनिक किडनी डिजीज होने को क्रोनिक रीनल फेल्योर, क्रोनिक किडनी रीनल या क्रोनिक किडनी फेल्योर के रूप में भी जाना जाता है। जब किडनी की कार्यक्षमता धीमी होने लगती है और स्थिति बिगड़ने लगती है, तब हमारे शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों और तरल की मात्रा खतरे के स्तर तक बढ़ जाती है। इसके उपचार का उद्देश्य रोग को रोकना या धीमा करना होता है। इसके मुख्य कारणों को नियंत्रित करके किया जाता है। साथ ही क्रोनिक किडनी डिजीज के लोगों की सोच से कहीं अधिक विस्तृत है। जब तक यह रोग शरीर में अच्छी तरह से फैल नहीं जाता है, तब तक रोग या इसके लक्षणों के बारे में कुछ भी पता नहीं चलता है। किडनी अपनी क्षमता से 75 प्रतिशत कम काम करती है, तब लोग यह महसूस कर पाते हैं कि उन्हें किडनी की बीमारी है।
किडनी के रोगों में क्रोनिक किडनी डिजीज एक गंभीर रोग है, क्योंकि वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में इस रोग को खत्म करने की कोई दवा उपलब्ध नहीं है। पिछले कई सालों से इस रोग के मरीजों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। दस में से एक व्यक्ति को किडनी की बीमारी होती है। डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, पथरी इत्यादि रोगों की बढ़ती संख्या इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
क्रोनिक किडनी डिजीज क्या हैं?
किडनी डिजीज में किडनी खराब होने की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है, जो महिनों या सालों तक चलती है। सीरम क्रिएटिनिन का स्तर अगर धीरे-धीरे बढ़ता है तो किडनी की कार्यक्षमता की इस रक्त जांच से गणना की जा सकती है। eGFR नामक जांच से क्रोनिक किडनी डिजीज के स्तर को हल्के माध्यम या गंभीर रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
साथ ही लंबे समय के बाद मरीजों की दोनों किडनी सिकुड़ कर एकदम छोटी हो जाती है और काम करना बंद कर देती है। जिसे किसी भी दवा, ऑपरेशन अथवा डायलिसिस से ठीक नहीं किया जा सकता है। क्रोनिक किडनी डिजीज के प्रांरभिक अवस्था में किडनी द्वारा कुछ हद तक कार्य संपादित होता है और अंतिम अवस्था में ही किडनी पूर्ण रूप से कार्य करना बंद कर देती है। क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीज का शुरूआती स्टेज उचित दवा देकर तथा खाने में परहेज से किया जा सकता है। 
क्रोनिक किडनी डिजीज कई महीनों तक होने वाली की क्रिया की प्रगतिशील नुकसान है और अंतरालीय फाइब्रोसिस के साथ किडनी की वास्तुकाल के प्रतिस्थापन द्वारा विशेषित है। क्रोनिक किडनी डिजीज के आधार पर पांच स्टेजों में या प्रोटीनुरिया या ग्लोम्युलर निस्पंदन पर (जीएफआर) 1 में कोई विशिष्ट लक्षण नहीं है और 5 स्टेज किडनी फेल्योर के साथ हल्का होता है। इसलिए आज हम उन्हीं पांच स्टेजों में से स्टेज 4 के बारे में बात करेंगे।
क्रोनिक किडनी डिजीज स्टेज - 4
क्रोनिक किडनी डिजीज की अवस्था में eGFR अर्थात किडनी की कार्यक्षमता में 15 से 29 मिली/मिनट तक की कमी आ सकती है। अब यह लक्षण हल्के, अस्पष्ट और अनिश्चित हो सकता है या बेहद तीव्र भी हो सकते हैं। यह किडनी फेल्योर और उससे जुड़ी बीमारी के मूल कारणों पर निर्भर करता है। 
क्रोनिक किडनी डिजीज स्टेज – 4 में नजर आने वाले लक्षण -
क्रोनिक किडनी फेल्योर, एक्यूट किडनी फेल्योर के विपरीत, एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है। अगर एक किडनी काम करना बंद कर देती है, तो दूसरी किडनी सामान्य रूप से कार्य कर सकती है। इसके लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते हैं, जब तक यह बीमारी अपने हाई स्टेज में नहीं पंहुच जाती है। इस स्टेज में बीमारी से हुए नुकसान को ठीक नहीं किया जा सकता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि, जिन लोगों में किडनी फेल होने की अधिक संभावना हो, उन्हें अपनी किडनी की नियमित रूप से जांच करानी चाहिए। बीमारी की शुरूआत में ही पता चल जाने पर किडनी में होने वाले गंभीर नुकसान को रोका जा सकता है।
·         शरीर में रक्त की कमी (एनीमिया)
·         पेशाब में रक्त का आना
·         पेशाब का रंग गहरा होना
·         मानसिक सतर्कता में कमी आना
·         हाथ, पैर, चेहरा और टखने में सूजन (एडिमा)
·         थकाम और कमजोर
·         हाई ब्लड प्रेशर
·         अनिंद्रा
·         त्वचा में लगातार खुजली होना
·         भूख कम लगना
·         स्तंभन दोष
·         मांसपेशियों में ऐंठन
·         जी मिचलाना
·         पीठ के मध्य से निचले हिस्से में दर्द
·         हांफना
·         पेशाब में प्रोटीन आना
·         अचानक सिरदर्द होना
·         वजन में अचानक बदलाव आना
क्रोनिक किडनी डिजीज स्टेज 4 रोगियों के लिए आहार -
किडनी शरीर के अधिक पानी, नमक और क्षार को पेशाब द्वारा दूर करके शरीर में इन पदार्थों का संतुलन बनाने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। किडनी फेल्योर के मरीजों में पानी, नमक, पोटेशियम युक्त आहार और खाद्य पदार्थ आदि अधिक मात्रा में लेने पर भी कई बार गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती है। किडनी फेल्योर के केस में किडनी सही से काम नहीं कर पाती, जिससे किडनी पर काफी बोझ पड़ता है। जिसके लिए शरीर में पानी, नमक और क्षारयुक्त पदार्थ की उचित मात्रा बनाए रखने के लिए आहार में जरूरी परिवर्तन करना आवश्यक है। किडनी फेल्योर के सफल उपचार में आहार के इस महत्व को ध्यान में रखना चाहिए। इन मरीजों को कुछ इस प्रकार के आहार का सेवन करना चाहिए जैसे –
·         लौकी - एक माध्यम आकार की लौकी में कम से कम 96 प्रतिशत पानी मौजूद होता है, जो किडनी के लिए फायदेमंद आहार मानी जाती है। लौकी में कई पोषत तत्व मौजूद होने की वजह से, इंसुलिन के बनने में मदद मिलती है। लौकी के सेवन से रक्त में मौजूद शर्करा को कम किया जा सकता है और इसके जूस को पीने से यूरिन इंफेक्सन के खतरे को भी कम कर सकते हैं।
·         तुरई - तुरई की बेल को ठंडे पानी या गाय के दूध में घिसकर, लगातार तीन दिन तक रोज सुबह खाली पेट पीने से आपकी स्टोन गलकर अपने आप यूरिन के माध्यम से बाहर निकल जाएगी। तुरई में कई पोष्टिक तत्व मौजूद होते हैं जैसे कि विटामिन ए, प्रोटीन, अधिक मात्रा में फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, पोटेशियम, फोलेट आदि।
·         टिंडा - टिंडा हमारे शरीर में मौजूद अपशिष्ट उत्पादों को बाहर निकालने में मदद करता है। रोज टिंडे का सेवन करना फायदेमंद रहेगा। टिंडे में पानी की मात्रा अधिक होने की वडह से यह पेशाब को बनाने में मदद करता है और किडनी के कार्य को करने में मदद करता है।
·         लाल अंगूर - लाल अंगूर को भी किडनी फ्रेंडली फ्रूट माना जाता है। यह काफी स्वादिष्ट होते हैं। लाल अंगूर में उच्च विटामिन-सी और भरपूर मात्रा में फ्लावोनोइड्स मौजूद होता है, जो एक एंटी ऑक्सीडेंट का काम करते है। लाल अंगूर के सेवन करने से शरीर में कभी रक्त नहीं जमता है।
·         सेब - सेब किडनी के मरीज के लिए सबसे अच्छे विकल्प के रूप में देखा जाता है। इसमें मौजूद उच्च फाइबर और एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण किडनी की बीमारी व किडनी को स्वस्थ रखने के लिए फायदेमंद है। सेब बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करता है साथ ही किडनी की बीमारी को रोकने में भी सहायक है। सेब के सेवन से आप दिल के रोग और कैंसर के खतरे को भी कम कर सकते हैं।
·         जैतून का तेल - किडनी को स्वस्थ रखने के लिए जैतून का तेल काफी फायदेमंद रहा है। इसमें मौजूद ओलेक एसिड और एंटी-इन्फ्लेमेरी फैटी एसिड हमारे शरीर में ऑक्सीडेशन को कम करता है। आप इसमें अपना भोजन पका कर भी खा सकते हैं।
·         लहसून - लहसून में पाएं जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट किडनी और हार्ट प्रॉब्लम की संभावना को कम करता है। दिन में एक या दो कच्चा लहसून की कलियों का सेवन करने से शरीर हाई कोलेस्ट्रॉल कम होता है।
·         लाल शिमला मिर्च - लाल शिमला मिर्च खाने से किडनी पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसमें विटामिन ए, बी-6 और सी, फोलिक एसिड और फाइबर से भरपूर होता है।
आप इन आहार का सेवन करने से पहले अपने पोषण विशेषज्ञ (dietician) की जरूर सलाह लें और अपनी किडनी की जांच जरूरी करवाएं, जिससे पता चल सके कि रोगी को कोन सी किडनी की बीमारी है और तुरंत कर्मा आयुर्वेदा से अपना आयुर्वेदिक इलाज शुरु करें।   

क्रोनिक किडनी डिजीज स्टेज 4 के लिए आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट –
आयुर्वेद में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के इलाज में मौजूद है। ऐसी चीजें जो हमारे आसपास ही है, लेकिन हमें इन चीजों के बारे में पता नहीं होता है। साथ ही यह कुछ जड़ी-बूटियां मौजूद है जो किडनी की बीमारी को जड़ से खत्म करने में मदद करती है जैसे – पुनर्नवा, वरुण, कासनी, गोखरू, पलाश, गुदुची, दालचीनी, हल्दी और नेटल लीफ आदि। आयुर्वेद की मदद से क्रोनिक किडनी डिजीज की जानलेवा बीमारी से आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है। आयुर्वेद में इस रोग को हमेशा के लिए खत्म करने की ताकत मौजूद है। जबकि एलोपैथी दवाओं में बीमारी से कुछ समय के लिए राहत भर ही आराम मिलता है, लेकिन आयुर्वेद में बीमारी को खत्म किया जाता है। आयुर्वेद की मदद से किडनी फेल्योर जैसी जानलेवा बीमारी से निदान पाया जा सकता है। आज के समय में कर्मा आयुर्वेदा प्राचीन आयुर्वेद के जरिए क्रोनिक किडनी डिजीज की अंतिम स्थिति जैसी गंभीर बीमारी का सफल इलाज कर रहा है।  
किडनी की बीमारी को दूर करने के लिए आयुर्वेद सबसे सफल माना गया है। कर्मा आयुर्वेदा भारत का प्रसिद्ध आयुर्वेदिक किडनी उपचार केंद्र है। यहां किडनी की बीमारियों का आयुर्वेदिक इलाज किया जाता है। यह सन् 1937 में धवन परिवार द्वारा स्थापित किया गया था और आज इसका नेतृत्व डॉ. पुनीत धवन कर रहे हैं। कर्मा आयुर्वेदा में सिर्फ आयुर्वेदिक उपचार पर भरोसा किया जाता है। साथ ही डॉ. पुनीत धवन ने सफलतापूर्वक और आयुर्वेदिक उपचार की मदद से 35 हजार से भी ज्यादा मरीजों का इलाज करके उन्हें रोग मुक्त किया है, वो भी डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट के बिना। आयुर्वेदिक उपचार में प्राकृतिक जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है जैसे पुनर्नवा, शिरीष, पलाश, कासनी, लाइसोरिस रूट और गोखरू आदि। यह जड़ी-बूटियां रोग को जड़ से खत्म करने में मदद करती हैं। 



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